बिहार में बुनकरों के बुरे हालात का जिम्मेदार कौन ?

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           बिहार में बुनकरों के बुर हालात का जिम्मेदार कौन ?
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                     बुनकरों पर सम्मेलन की तस्वीर 
                       Journalist Rana Shaidai 
भारत देश में बुनकरों का इतिहास बहुत पुराना है बुनकरों ने देश की आजादी से लेकर गांधी के विचारों तक और उनके आंदोलन में अहम भूमिका निभाई है और भारत देश की बेहतर दशा और दिशा में उनका का बहुत बड़ा योगदान रहा है। लेकिन आज इस आधुनिक युग में बुनकर समाज जैसे भारत के ज़मीन से मिट गया हो ऐसा दिखाई पड़ता है ना तो उसकी कोई बात करता है और ना ही उनके हालात को सुधारने का कोई प्रयास बिहार में बुनकरों की स्थिति ऐसी है कि जैसे सरकारी दफ्तरों में लाखों फाइलों के नीचे दबा कोई ऐसा कागज जिसे दबाकर भुला दिया गया हो। बिहार में बुनकरों की एक बड़ी आबादी है। लेकिन उनके हालात आज हाशिए पर हैं बुनकरों का काम कपड़ा बुनने का काम है जो पूरी तरीके से स्वदेशी कपड़े बुनने पर आश्रित थे। बुनकर कपड़ों को बुनने का काम करते हैं और फिर उसे बाजारों में बेचते हैं लेकिन आज उनको आगे बढ़ाने के लिए कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है सरकार तमाम व्यवस्था की बात तो करती है लेकिन उसके बावजूद उनके हालात नहीं बदल रहे हैं और इसके पीछे बड़ी वजह है कि बुनकरों के नाम पर तो राजनीति होती है और बुनकरों की बात करके लोग सत्ता में खुद को स्थापित तो कर लेते हैं। लेकिन उनके उत्थान के लिए कोई काम नहीं करते हैं। समझ नहीं आता कि इसमें दोष सरकार का है या फिर उन रहनुमाओं का जो बुनकर और पिछड़ों की बात करके सत्ता में अपने आप को स्थापित करते हैं। 11 जनवरी 2026 को इन्हीं सब को ध्यान में रखते हुए शाहिद अली अंसारी ने बुनकरों की बात को बहुत मजबूती से उठाया है और बुनकर समाज में एक उम्मीद की लॉ जलाई है शाहिद अली अंसारी कई दशकों से बुनकरों पर काम करते आए हैं लेकिन उनके संघर्ष पर आज तक उनको वह मजबूती नहीं प्रदान हुई जिससे वह बढ़-चढ़कर बुनकरों की बात कर सकें और उनके भविष्य में सुधार कर सकें आपको बता दे की पटना में बुनकरों के नाम से एक बुनकर भवन भी बना हुआ है उसमें कई बार सरकारों की तरफ से नुमाइंदा तो भेजा गया लेकिन उन लोगों ने भी इस पर कोई काम नहीं किया और बस ऊपर ऊपर से समाज और बुनकरों को आश्वासन ही देते रहे अगर बात की जाए बुनकरों के बच्चों की तो उनकी तालीम भी आज बहुत बेहतर नहीं है वजह है कि वह आर्थिक रूप से बहुत कमजोर और असहाय है कुछ सालों पहले इस  बुनकर भवन में बुनकर के बच्चों के लिए छात्रावास की बात की गई थी लेकिन आज भी वह काम अधूरा ही है। बिल्कुल उसी तरह जिस तरीके से बुनकर भवन में कपड़ा बने वाली मशीन अपना दम तोड़ चुकी है और उनको बस इसलिए वहां रखा गया है कि बुनकरों के इतिहास का तमाशा बनाया जा सके और उसे पर राजनीति की जा सके लेकिन बड़ा सवाल यह है बिहार के अंदर न्याय वाली सरकार होते हुए भी बुनकरों के हालात क्यों नहीं सुधार पा रहे हैं और इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है बुनकरों के रहनुमा जो समाज और बुनकरों को सिर्फ और सिर्फ आश्वासन और उनके नाम पर राजनीति कर अपने आप को सत्ता में स्थापित किए हुए हैं। लेकिन अगर बात शाहिद अली अंसारी की की जाए तो बुनकरों की एक बड़ी जमात इनके तरफ बहुत उम्मीद लगाए हुए हैं। जिस ईमानदारी के साथ यह बुनकरों की आवाज बनकर बुनकर समाज के आर्थिक सामाजिक और शैक्षणिक रूप से बुनकर समाज का भला करने की कोशिश कर रहे हैं या उम्मीद है की आने वाले दिनों में कुछ बेहतर हो सकता है अभी जरूरत है समाज को ऐसे लोगों को मजबूत करने की लेकिन देखना यह है की बुनकर समाज क्या वापस से अपने आप को जिंदा कर पता है या नहीं या खबर 11 जनवरी 2026 को हुए बुनकरों के सम्मेलन को देखते हुए लिखी गई है । सेमिनार में तमाम कई बुनकर समाज और उससे अलग पिछड़े और दलित मुसलमान की बात करने वाले नेताओं की भी भागीदारी दिखाई दी। मैं जर्नलिस्ट राणा शैदाइ आपको इससे जुड़ी तमाम खबरों को आप तक पहुंचाने का प्रयास करता रहूंगा इसीलिए आप Ecobihar.com और ecobihar के फेसबुक पेज से जुड़ जाए।

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